Monday, June 15, 2009

नियति

कड़ी धूप से जलता रेत,
मौन मूक ये नंगे खेत,
चिलचिलाती लू, ये तप्त दिशाएं,
नग्न तरुओं की गूंगी कतारें,
निरीह प्राणी ये मूक बधिर,
कूकती टिटहरी, ये चिल्लाते सारस,
हह: तरसता व्याकुल ये पपीहा,
मांस नोंचते ये, भूखे गिद्ध,
मंडराती चीलों के ये चक्रित झुंड,
प्यासे नदी, कुँए और ताल,
वृद्धों, बालकों की ये गणनीय पंसुरियाँ,
भूखी प्यासी, आकुल ये मवेशी,
सूखे मुरझाए से ये धान,
चलती फिरती ये नारालाशें
उनकी भीगी , नम ये आँखें,
तिस पर चिढाता ये चंद्रहास ,
सबकी एक ही नियति
सबका एक ही भाग्य विधाता।
23.6.1987

No comments:

Post a Comment