Monday, June 15, 2009

तृष्णा

फुटपाथ पर किनारे
पड़ी है एक औरत ,
अधनंग,घायल, बेबस लाचार,
देखो, उसके समीप से
हँसता रुधिर कहता है
कहानी उस इंसान की
जो भटक रहा है दिशा दिशा
करने अतृप्त सागरों की
एक क्षुद्र तृष्णा,
जिससे पनपता है
एक बवंडर,
जो बदल देता है
संस्कृति, सभ्यता
साहित्य और समाज
कौन है ये छवि
सोचा कभी ?
16.04.1988

No comments:

Post a Comment