संपूर्ण सृष्टि
अपने आप में
पूर्ण है परन्तु
अपूर्णता में बिखरी हुई,
टूटी हुई इस अपूर्णता का
अहसास भ्रांतिपूर्ण है,
फ़िर सृष्टि की रचना का आधार
भी तो द्रव्य और प्रतिद्रव्य का अलग
अलग समय पर अस्तित्व ही तो है।
द्रव्य और प्रतिद्रव्य का मिलना एक
विस्फोटकारी स्थिति के बाद शून्य
मातृ ही तो है,
शून्य सीमा है और
प्रतिशून्य सृष्टि ?
नहीं क्या ?
4.9.1985
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