Monday, June 15, 2009

प्रेरणा

तुमको पाकर
मैं पूर्णता को
प्राप्त होना चाहता हूँ ।
क्योंकि मेरा अस्तित्व
अभी अधूरा है, अपूर्ण है ।
तुमको पाने की दिशा में,
मेरा हर प्रयास सम्भव है ।
परन्तु समाया, नियति और
प्रराभ्ध दिशा बदल सकते हैं ।
इसकी मुझे क्या चिंता ?
क्योंकि मेने तो स्वयं को इन
बाधाओं के अनुरूप ढाल लिया है।
रास्ता कठिन है, दुर्गम है,
काँटों भरा और संघर्षमय है ।
क्योंकि यही जीवन का यथार्थ है,
यथार्थ ही सत्य है ।
जीवन का यथार्थ
भयानक है, विद्रूप है ।
और आशा ही
मेरी संभावना है ।
क्योंकि संभावनाएं हर उद्देश्य
की ओर अभिमुख हैं, केंद्रित हैं ।
मैं जानता हूँ , मेरी
संभावनाओं का संबल
तुम्हारी अथाह प्रेरणा है ।
क्योंकि इसी प्रेरणा में
छुपा है मेरा घोर
परिश्रम, तपस्या, लगन, कर्मनिष्ठा ।
संकल्प और जिजीविषा
यही तो पथ है,
उस उद्देश्य यानी
तुम तक पहुँचने का।
क्योंकि तोमको पाकर
मुझे अनुभव होगा
उस पूर्णता का ।
जो जीवन पराकाष्ठा है,
चरम बिन्दु है,
जिसमें छुपा है
अनंत आनंद का अथाह समुद्र ।
२४.९.1990

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