कभी सोचा न था,
तुम्हारे प्रतिबिम्ब की
कल्पना मात्र डुबो देगी
इस तरह आत्म मंथन की
गहराईयों में ।
जैसे सागर के उस पार तुम'
इस पार मैं,
मेरे ऊपर का आकाश का विस्तार,
दूर तुम्हारे ही किनारे पर
मिल कर स्थापित करता है,
एक तादात्म्य
एक लंबा स्पर्श युक्त, भ्रांतिपूर्ण क्षितिज।
जो न होते हुए भी है प्रतीयमान ।
इस क्षितिज के मध्य एक अस्पष्ट लकीर,
वह तुम ही तो हो, इस किनारे के रूप में विद्यमान,
क्षितिज से मेरी ओर आती हुई यह चंचल लहरें,
जेसे मुझ से ही निकल कर मेरे अन्दर समाने
का प्रयास,
यहाँ से वहां तक शांत और गंभीर
आवरण के नीचे, यह चंचल व्याकुल धरातल
जेसे मुझ में ही अंतर्भूत ये हलचल,
फ़िर भी तुम्हारा और मेरा अलग अलग
भोतिक अस्तित्व,
नही है क्या यह एक प्रवंचना ?
४.१०.१९९०
तुम्हारे प्रतिबिम्ब की
कल्पना मात्र डुबो देगी
इस तरह आत्म मंथन की
गहराईयों में ।
जैसे सागर के उस पार तुम'
इस पार मैं,
मेरे ऊपर का आकाश का विस्तार,
दूर तुम्हारे ही किनारे पर
मिल कर स्थापित करता है,
एक तादात्म्य
एक लंबा स्पर्श युक्त, भ्रांतिपूर्ण क्षितिज।
जो न होते हुए भी है प्रतीयमान ।
इस क्षितिज के मध्य एक अस्पष्ट लकीर,
वह तुम ही तो हो, इस किनारे के रूप में विद्यमान,
क्षितिज से मेरी ओर आती हुई यह चंचल लहरें,
जेसे मुझ से ही निकल कर मेरे अन्दर समाने
का प्रयास,
यहाँ से वहां तक शांत और गंभीर
आवरण के नीचे, यह चंचल व्याकुल धरातल
जेसे मुझ में ही अंतर्भूत ये हलचल,
फ़िर भी तुम्हारा और मेरा अलग अलग
भोतिक अस्तित्व,
नही है क्या यह एक प्रवंचना ?
४.१०.१९९०
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