Monday, June 15, 2009

कांटेदार बबूल

काले केकडे के कड़े कवच के भीतर
ककूनो सा सिकुड़ गया है आदमी,
आंखों से निकल कपोलों पर ढुलक
कर बह जाए, वो करुण आंसू
पी गया है आदमी ।
सफ़ेद खोल के पीछे,
घोंघे के नरम मांस सा अटा पड़ा है।
भीतर से बबूल की सूखी कांटेदार डंडियों
सा पटा पड़ा है।
जहाँ से भी छुओ
उंगली के नरम पोटुओं में
कांटे सा चुभ जाता है आदमी ।
अन्तर से निकल फूलों की गंध सा
बह जाए सम्भव नहीं,
पत्थर से फूट गरम चश्मों सा
निकल, झर जाए मुमकिन नहीं ।
नदियों से निकल,
किसी सूखे गड्ढे में
पोखर सा भर गया है आदमी।
२५.०९.1994

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