आपके हमारा होने का अहसास
मातृ देता है,
गहरे समुद्र की शान्ति सा
अथाह आनंद,
चरम सीमा का संतोष,
असीमित प्रसन्नता की
पराकाष्ठा का शाश्वत अनुभव,
बुझ रही है तृष्णा,
व्याकुल पपीहे की,
तपती सोंधी धरती पर बरस गया
है शीतल पानी जैसे,
कैद हुआ भ्रमर सुंदर पुष्प में
मिल गयी है जैसे नदी सागर में
सागर आकाश में ।
1.09.2009
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