ताकते रहे खड़े एक किनारे
उन घूमते गलियारों के भूल भूलइये,
नापते रहे चौराहों के गोल गोल दरमियाने,
टिमटिमाती रहीं, मीनारों की पेंचदार
खिड़कियों से लाल सुर्ख रोशनियाँ ।
सहते रहे अपने सीने में,
ऊँची नीची सडकों पर जलती बुझती बत्तियां ।
हर हवा के झोंके से थिरकती रही
मेरे घर के दिए की लौ ।
संजोते रहे जेहन में हम
अपने ऊपर का अन्धकार ,
हौले हौले सींचते रहे अपने
संबंधों की दरार ।
२८.०८.1995
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good poem indeed
ReplyDeletei liked it
will like to have more of your creations
keep it up