Monday, June 15, 2009

शहर एक बेगाना

ताकते रहे खड़े एक किनारे
उन घूमते गलियारों के भूल भूलइये,
नापते रहे चौराहों के गोल गोल दरमियाने,
टिमटिमाती रहीं, मीनारों की पेंचदार
खिड़कियों से लाल सुर्ख रोशनियाँ ।
सहते रहे अपने सीने में,
ऊँची नीची सडकों पर जलती बुझती बत्तियां ।
हर हवा के झोंके से थिरकती रही
मेरे घर के दिए की लौ ।
संजोते रहे जेहन में हम
अपने ऊपर का अन्धकार ,
हौले हौले सींचते रहे अपने
संबंधों की दरार ।
२८.०८.1995

1 comment:

  1. good poem indeed
    i liked it
    will like to have more of your creations
    keep it up

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