आईने के बाहर खड़े,
खुरचते रहें हम,
अपने बासी चेहरे की
उपटतीं पपडियां
सूखे सफ़ेद बालों की
सिकुडतीं चमडियाँ ।
पीले दरकते नाखूनों की कोरों से
उचेलते रहे खुरं टीले होंटों की
झड़ती बीवाइयां,
और आईना के पीछे का भुतहा
प्रतिबिम्ब नोच नोच कर
उतारता रहा कंठ के नीचे
समय के खूनी पंजों का ज़हर
२८.०८.1995
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