Monday, June 15, 2009

अमृत-मकरंद

में एक पागल पुलकित भ्रमर,
करने दो मुझे हर पुष्प का
अमृत मकरंद रसपान,
पीलूं प्राण प्रण से,
जीलूं कुछ क्षण
संपूर्ण गह्रत्व से, आनंद से,
भटकना चाहता हूँ ,
अनंत समय तक इसी ,
रंगीन आनंदमय उपवन में,
नहीं चाहिए वह अपरिवर्तनीय,
ऊर्जा रहित, निर्जीव, स्थिर, अस्वाद, मोक्ष,
१६.१०.1991

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