Monday, June 15, 2009

शहर एक बेगाना

ताकते रहे खड़े एक किनारे
उन घूमते गलियारों के भूल भूलइये,
नापते रहे चौराहों के गोल गोल दरमियाने,
टिमटिमाती रहीं, मीनारों की पेंचदार
खिड़कियों से लाल सुर्ख रोशनियाँ ।
सहते रहे अपने सीने में,
ऊँची नीची सडकों पर जलती बुझती बत्तियां ।
हर हवा के झोंके से थिरकती रही
मेरे घर के दिए की लौ ।
संजोते रहे जेहन में हम
अपने ऊपर का अन्धकार ,
हौले हौले सींचते रहे अपने
संबंधों की दरार ।
२८.०८.1995

भुतहा प्रतिबिम्ब

आईने के बाहर खड़े,
खुरचते रहें हम,
अपने बासी चेहरे की
उपटतीं पपडियां
सूखे सफ़ेद बालों की
सिकुडतीं चमडियाँ ।

पीले दरकते नाखूनों की कोरों से
उचेलते रहे खुरं टीले होंटों की
झड़ती बीवाइयां,
और आईना के पीछे का भुतहा
प्रतिबिम्ब नोच नोच कर
उतारता रहा कंठ के नीचे
समय के खूनी पंजों का ज़हर

२८.०८.1995

मेरे घर के ऊपर का आकाश

देख सकता हूँ मैं,
अपनी चौखट पर,
भोर के तारे का उज्जवल
प्रकाश,
अरे ! तुम अभी तक बच्चे के
लिए क्रोशिए पर प्रेम की ऊन
गूँथ रही हो, देखो, पीछे के
खेत के झुरमुटों से कुछ मोर ।
दूब की पत्तियों की नोंक पर
ओस की बूंदों ने,
बादलों के घर से आ कर
मेरे घर के आँगन मैं दस्तक दी है,
कोहरे की धुंध मैं मीनारों की लम्बाई
नापती चीलों ने मेरे घर के ऊपर का
आकाश घेर लिया है।
२६.०८.1995

अमृत-मकरंद

में एक पागल पुलकित भ्रमर,
करने दो मुझे हर पुष्प का
अमृत मकरंद रसपान,
पीलूं प्राण प्रण से,
जीलूं कुछ क्षण
संपूर्ण गह्रत्व से, आनंद से,
भटकना चाहता हूँ ,
अनंत समय तक इसी ,
रंगीन आनंदमय उपवन में,
नहीं चाहिए वह अपरिवर्तनीय,
ऊर्जा रहित, निर्जीव, स्थिर, अस्वाद, मोक्ष,
१६.१०.1991

अनुभव

आपके हमारा होने का अहसास
मातृ देता है,
गहरे समुद्र की शान्ति सा
अथाह आनंद,
चरम सीमा का संतोष,
असीमित प्रसन्नता की
पराकाष्ठा का शाश्वत अनुभव,
बुझ रही है तृष्णा,
व्याकुल पपीहे की,
तपती सोंधी धरती पर बरस गया
है शीतल पानी जैसे,
कैद हुआ भ्रमर सुंदर पुष्प में
मिल गयी है जैसे नदी सागर में
सागर आकाश में ।
1.09.2009

कांटेदार बबूल

काले केकडे के कड़े कवच के भीतर
ककूनो सा सिकुड़ गया है आदमी,
आंखों से निकल कपोलों पर ढुलक
कर बह जाए, वो करुण आंसू
पी गया है आदमी ।
सफ़ेद खोल के पीछे,
घोंघे के नरम मांस सा अटा पड़ा है।
भीतर से बबूल की सूखी कांटेदार डंडियों
सा पटा पड़ा है।
जहाँ से भी छुओ
उंगली के नरम पोटुओं में
कांटे सा चुभ जाता है आदमी ।
अन्तर से निकल फूलों की गंध सा
बह जाए सम्भव नहीं,
पत्थर से फूट गरम चश्मों सा
निकल, झर जाए मुमकिन नहीं ।
नदियों से निकल,
किसी सूखे गड्ढे में
पोखर सा भर गया है आदमी।
२५.०९.1994

श्रंखला की कडियाँ

मेरी विचार श्रंखला
का आधार
तुम ही तो हो ।
इन्ही श्रंखला की
कड़ियों को में
पल पल जीता हूँ ।
२९.१२.1990

वेदना

केसे करूँ व्यक्त
शब्दों में,
अंतर्मन की वेदना ?
कारण कदापि तुम
से वियोग नहीं ।
अनुभव है ये
समाज और परिस्थिति जन्य
उन बाधाओं का।
होती है जिससे
मेरी वेदना व्याकुल।
१६.१०.१९९०

प्रवंचना

कभी सोचा न था,
तुम्हारे प्रतिबिम्ब की
कल्पना मात्र डुबो देगी
इस तरह आत्म मंथन की
गहराईयों में ।
जैसे सागर के उस पार तुम'
इस पार मैं,
मेरे ऊपर का आकाश का विस्तार,
दूर तुम्हारे ही किनारे पर
मिल कर स्थापित करता है,
एक तादात्म्य
एक लंबा स्पर्श युक्त, भ्रांतिपूर्ण क्षितिज।

जो न होते हुए भी है प्रतीयमान ।
इस क्षितिज के मध्य एक अस्पष्ट लकीर,
वह तुम ही तो हो, इस किनारे के रूप में विद्यमान,
क्षितिज से मेरी ओर आती हुई यह चंचल लहरें,
जेसे मुझ से ही निकल कर मेरे अन्दर समाने
का प्रयास,
यहाँ से वहां तक शांत और गंभीर
आवरण के नीचे, यह चंचल व्याकुल धरातल
जेसे मुझ में ही अंतर्भूत ये हलचल,
फ़िर भी तुम्हारा और मेरा अलग अलग
भोतिक अस्तित्व,
नही है क्या यह एक प्रवंचना ?
४.१०.१९९०


चेतना

है ये जीवन
समय की विमा के संगत,
भौतिक पृष्ठभूमि पर
खिचने वाली,
चेतना की एक अल्पकालिक लकीर,
लकीर का भौतिक अस्तित्व
अस्थायी है, अंतरिम है
परन्तु संपूर्ण चेतना से,
सुकर्म द्वारा एकत्रित उपलब्धियां ,
देती हैं "आयाम"
एक शाश्वत चेतना के
स्थायित्व को,
जिसकी प्रेरणा से
होता है परिष्कार ।
३०.९.1990

प्रेरणा

तुमको पाकर
मैं पूर्णता को
प्राप्त होना चाहता हूँ ।
क्योंकि मेरा अस्तित्व
अभी अधूरा है, अपूर्ण है ।
तुमको पाने की दिशा में,
मेरा हर प्रयास सम्भव है ।
परन्तु समाया, नियति और
प्रराभ्ध दिशा बदल सकते हैं ।
इसकी मुझे क्या चिंता ?
क्योंकि मेने तो स्वयं को इन
बाधाओं के अनुरूप ढाल लिया है।
रास्ता कठिन है, दुर्गम है,
काँटों भरा और संघर्षमय है ।
क्योंकि यही जीवन का यथार्थ है,
यथार्थ ही सत्य है ।
जीवन का यथार्थ
भयानक है, विद्रूप है ।
और आशा ही
मेरी संभावना है ।
क्योंकि संभावनाएं हर उद्देश्य
की ओर अभिमुख हैं, केंद्रित हैं ।
मैं जानता हूँ , मेरी
संभावनाओं का संबल
तुम्हारी अथाह प्रेरणा है ।
क्योंकि इसी प्रेरणा में
छुपा है मेरा घोर
परिश्रम, तपस्या, लगन, कर्मनिष्ठा ।
संकल्प और जिजीविषा
यही तो पथ है,
उस उद्देश्य यानी
तुम तक पहुँचने का।
क्योंकि तोमको पाकर
मुझे अनुभव होगा
उस पूर्णता का ।
जो जीवन पराकाष्ठा है,
चरम बिन्दु है,
जिसमें छुपा है
अनंत आनंद का अथाह समुद्र ।
२४.९.1990

सृष्टि

संपूर्ण सृष्टि
अपने आप में
पूर्ण है परन्तु
अपूर्णता में बिखरी हुई,
टूटी हुई इस अपूर्णता का
अहसास भ्रांतिपूर्ण है,
फ़िर सृष्टि की रचना का आधार
भी तो द्रव्य और प्रतिद्रव्य का अलग
अलग समय पर अस्तित्व ही तो है।
द्रव्य और प्रतिद्रव्य का मिलना एक
विस्फोटकारी स्थिति के बाद शून्य
मातृ ही तो है,
शून्य सीमा है और
प्रतिशून्य सृष्टि ?
नहीं क्या ?
4.9.1985

बालश्रमिक

तप्त धूप, सिक्त भू
आसन्न वादन चिर चूप
रिक्त पेट, सिक्त जेठ,
दीन हीन, स्वकर्म लीन,
बाल श्रमिक रक्तहीन ।
28.08.1985

नियति

कड़ी धूप से जलता रेत,
मौन मूक ये नंगे खेत,
चिलचिलाती लू, ये तप्त दिशाएं,
नग्न तरुओं की गूंगी कतारें,
निरीह प्राणी ये मूक बधिर,
कूकती टिटहरी, ये चिल्लाते सारस,
हह: तरसता व्याकुल ये पपीहा,
मांस नोंचते ये, भूखे गिद्ध,
मंडराती चीलों के ये चक्रित झुंड,
प्यासे नदी, कुँए और ताल,
वृद्धों, बालकों की ये गणनीय पंसुरियाँ,
भूखी प्यासी, आकुल ये मवेशी,
सूखे मुरझाए से ये धान,
चलती फिरती ये नारालाशें
उनकी भीगी , नम ये आँखें,
तिस पर चिढाता ये चंद्रहास ,
सबकी एक ही नियति
सबका एक ही भाग्य विधाता।
23.6.1987

तृष्णा

फुटपाथ पर किनारे
पड़ी है एक औरत ,
अधनंग,घायल, बेबस लाचार,
देखो, उसके समीप से
हँसता रुधिर कहता है
कहानी उस इंसान की
जो भटक रहा है दिशा दिशा
करने अतृप्त सागरों की
एक क्षुद्र तृष्णा,
जिससे पनपता है
एक बवंडर,
जो बदल देता है
संस्कृति, सभ्यता
साहित्य और समाज
कौन है ये छवि
सोचा कभी ?
16.04.1988

काल

तोड़ ही डाला
फूल एक मैंने,
कर दिया नाश
एक वंश का
एक सुन्दरता का
एक प्रेरणा का
एक आनंद का
एक काल का
एक युग का
17.3.1989

शंका

बदल चुके हैं मंजर
रेत के टीलों से,
पिघल चुके हैं ख्वाब
बर्फ के दरियों से,
गुजर रहा है वक्त
सनसनाते तूफानों सा
मच रहा है शोर
सन्नाटों के बीच ,
खोज रहा हूँ तुझे ,
मगर शायद शंका है
इन गुजरते बवंडरों में
इतनी आसानी से मिलोगी मुझे ?
26.1.1989

सौंदर्य

अंश हूँ मैं भी
प्रकृति का ऐक
प्रेम है मुझे
नैसर्गिक सौंदर्य से
भीतर छुपा है रहस्य कोई
मन बरबस आकर्षित होता है
प्रकृति से
मालूम है मुझे भी
तुम ही हो अंश प्रकृति का
1.1.1988

Sunday, June 14, 2009

मंजिल

पार आना चाहा
रास्ते न थे
दूर जाना चाहा
मंजिल न थी
न जाने ये क्या था
खींच लाया पास तुम्हारे
बिना मंजिल बिना रास्ते।
31.1.1988